नक्षत्र (Nakshatra) क्या होता है ? नक्षत्रों की क्या विशेषताएं हैं ?

हैलो दोस्तों,  हमारे ब्लॉग में आपका स्वागत है। आज हम इस पोस्ट में नक्षत्र के बारे में बताएंगे। नक्षत्र  क्या है? नक्षत्र कितने होते हैं? नक्षत्रों की पौराणिक कथा क्या है? नक्षत्रों की क्या विशेषताएं है? तो आइए जानते हैं नक्षत्र के बारे में ।

नक्षत्र (Nakshatra) क्या होता है ?

Contents

हिन्दू काल गणना का आधार नक्षत्र, सूर्य और चन्द्र की गति पर आधारित है। इसमें नक्षत्र को सबसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। तारों के समूह को नक्षत्र कहते हैं। हमारे आकाश मण्डल में 27 नक्षत्र दिखाई देते हैं। नक्षत्र हमारे आकाश मण्डल के मील के पत्थरों की तरह है जिससे आकाश की व्यापकता का पता चलता है।

वैसे तो 88 नक्षत्र हैं किंतु चन्द्र पथ पर 27 ही माने गए हैं। जिस तरह सूर्य मेष से लेकर मीन तक भ्रमण करता है, उसी तरह चन्द्रमा अश्विन से लेकर रेवती तक के नक्षत्र में विचरण  करता है तथा वह काल नक्षत्र मास कहलाता है। यह लगभग 27 दिनों का होता है,  इसलिए 27 दिनों का एक नक्षत्र मास कहलाता है।

नक्षत्रों (Nakshatron) की पौराणिक कथा क्या है ?

हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार 27 नक्षत्र चन्द्रमा की पत्नियां थीं जो राजा दक्ष की पुत्रियाँ थी। उसमें चन्द्रमा की सबसे प्रिय पत्नी रोहिणी थी और इस प्रकार सबसे अधिक समय रोहिणी के साथ बिताते थे।

दूसरी पत्नियों को समय नहीं देते थे। राजा दक्ष ने चन्द्रमा को शाप दे दिया कि आप सभी पत्नियों के पास जाएंगे और किसी एक पत्नी के पास अधिक नहीं रुक पाएंगे। इसलिए चन्द्रमा 30 दिनों में सभी नक्षत्रों में गमन करते हैं।

नक्षत्र (Nakshatra) कितने होते हैं ?

नक्षत्र 27 होते हैं, जिनके अपने देवता और स्वामी ग्रह हैं। ये इस प्रकार हैं–

1.अश्विन नक्षत्र

2.भरणी नक्षत्र

3.कृतिका नक्षत्र

4.रोहिणी नक्षत्र

5.मृगशिरा नक्षत्र

6.आर्द्रा नक्षत्र

7.पुनर्वसु नक्षत्र

8.पुष्य नक्षत्र

9.अश्लेषा नक्षत्र

10.मघा नक्षत्र

11.पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र

12.उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र

13.हस्त नक्षत्र

14.चित्रा नक्षत्र

15.स्वाति नक्षत्र

16.विशाखा नक्षत्र

17.अनुराधा नक्षत्र

18.ज्येष्ठा नक्षत्र

19.मूल नक्षत्र

20.पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र

21.उत्तराषाढ़ा नक्षत्र

22.श्रवण नक्षत्र

23.धनिष्ठा नक्षत्र

24.शतभिषा नक्षत्र

25.पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र

26.उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र

27.रेवती नक्षत्र

Nakshatra

नक्षत्रों (Nakshatron) की क्या विशेषताएं हैं ?

अश्विन नक्षत्र

नक्षत्रों में अश्विन नक्षत्र पहला नक्षत्र है। अश्विन का अर्थ ‘घुड़सवारि का या एक घोड़े का जन्म’ तथा अश्विन नक्षत्र का प्रतीक ‘एक घोड़े का सिर’ होता है। इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह केतु हैं और नक्षत्र देवता अश्विन कुमार हैं ।

अश्विन नक्षत्र में जन्मे जातक सामान्यतः सुन्दर , चतुर,  सौभाग्यशाली एवं स्वतंत्र विचारों वाले होते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक साज– सज्जा में अधिक विश्वास रखते हैं इसलिए सदा ही आकर्षक मँहगी और आरामदायक वस्तुओं में रुचि रखते हैं।

भरणी नक्षत्र

नक्षत्रों की कड़ी में भरणी नक्षत्र को द्वितीय नक्षत्र माना जाता है। इस नक्षत्र का ज्योतिष शास्त्र में बहुत अधिक महत्व होता है। भरणी का अर्थ‘धारक’ होता है तथा इस नक्षत्र का प्रतीक ‘त्रिकोण’ होता है। भरणी नक्षत्र का स्वामी ग्रह शुक्र होता है और नक्षत्र देवता यम होते हैं।

इस नक्षत्र के जातक सुख-सुविधाओं एवं आराम चाहने वाले होते हैं । ये कला के प्रति आकर्षित रहते हैं और संगीत,  नृत्य, चित्रकला आदि में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। ये स्वतंत्र प्रकृति के एवं सुधारात्मक दृष्टि कोण रखने वाले होते हैं ।

कृतिका नक्षत्र

कृतिका नक्षत्र आकाश मण्डल में तीसरा नक्षत्र है। कृतिका का अर्थ‘वह जो काटता है’ तथा इस नक्षत्र का प्रतीक ‘कुल्हाड़ी, ज्वाला, उस्तरा होता है। इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह सूर्य होता है तथा नक्षत्र देवता अग्नि हैं।

कृतिका नक्षत्र पृथ्वी से देखने पर आस-पास दिखने वाले कई तारों के इस समूह को भारतीय खगोलशास्त्र और हिन्दू धर्म में सप्तऋषि की पत्नियां भी कह गया है।इस नक्षत्र में पैदा हुए जातक साहसी होते है, शारीरिक रूप से काफी सक्रिय व ऊर्जावान होते है। इनकी वाणी तीक्ष्ण होती है परन्तु फिर भी उनके पास अद्भुत इच्छा शक्ति,  स्वतंत्रता व दूसरों की सहायता करने की शक्ति होती है। यह नक्षत्र साहस, जागरूकता व शुद्धिकरण से सम्बंधित है।

रोहिणी नक्षत्र

रोहिणी नक्षत्र आकाश मण्डल में चौथा नक्षत्र है। रोहिणी का अर्थ ‘लाल वर्ण वाला, बढ़ने वाला’होता है तथा इस नक्षत्र का प्रतीक एक बैलगाड़ी, रथ होता है। इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह चन्द्रमा होता है तथा इस नक्षत्र के देवता ब्रह्मा हैं।

इस नक्षत्र में जन्मे जातक की शारीरिक बनावट साधारण होती है। ये मृदुभाषी व प्रसिद्ध व्यक्ति होते हैं। इनका गुण कोमल व स्वभाव सभ्य, बुद्धिमान और कुशल होते हैं। इस नक्षत्र के जातक को इमानदारी और वफादारी पसंद होता है।

मृगशिरा नक्षत्र

नक्षत्रों के गणना क्रम में मृगशिरा नक्षत्र का पाँचवाँ स्थान है। मृग शिरा का अर्थ‘हिरण का सिर या उदार’ होता है तथा इस नक्षत्र का प्रतीक ‘हिरण का सिर’ होता है।इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह मंगल होता है। इसके नक्षत्र देवता चन्द्रमा हैं।

इस नक्षत्र के जातक दृढ़ निश्चयी होते हैं। ये आकर्षक व्यक्तित्व और रुप के स्वामी होते हैं। ये हमेशा सावधान एवं सचेत रहते हैं। ये मानसिक तौर पर बुद्धिमान और शारीरिक तौर पर तंदुरुस्त होते है। ये संसारिक सुखों का उपभोग करने वाले होते हैं।

आर्द्रा नक्षत्र

आर्द्रा नक्षत्र का नक्षत्रों में छठवां नक्षत्र है। आर्द्रा का अर्थ नम होता है तथा इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह राहु होता है तथा इस नक्षत्र के देवता शिव होते हैं।

इस नक्षत्र में जन्मे जातक चंचल स्वभाव के, हँसमुख, अभिमानी, दुख पाने वाले, बुरे विचारों वाले व्यसनी होते हैं।ये लोग राजनीति में पराक्रमी, चतुर, चालाक अपने विरोधियों को परास्त करने वाले होते हैं।

पुनर्वसु नक्षत्र

पुनर्वसु नक्षत्र आकाश मण्डल में सातवां नक्षत्र है।पुनर्रका अर्थ आवृत्ति है तथा वसुका अर्थ प्रकाश की किरण है। इस प्रकार पुनर्वसु का अर्थ‘पुनः प्रकाश बनने से है’ होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ‘तीरों का तरकश ’है जो इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं के प्रति प्रयास करने की क्षमता को दर्शाता है। इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह बृहस्पति होता है तथा इस नक्षत्र के देवता आदित्य होते हैं।

पुनर्वसु निवास से सम्बंधित नक्षत्र है इसलिए इस नक्षत्र में उत्पन्न लोग प्रायः अपने घर में रहना पसंद करते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक धर्म निष्ठ, उत्तम व्यवहार, शांत, धैर्यवान, बौद्धिक और अध्यात्मिक ज्ञान से युक्त होते हैं।

पुष्य नक्षत्र

पुष्य नक्षत्र , नक्षत्रों के कड़ी में आठवां नक्षत्र है। सभी नक्षत्रों में पुष्य नक्षत्र को सबसे अच्छा माना जाता है। पुष्य का अर्थ ‘पोषण करने वाला, ऊर्जा व शक्ति प्रदान करने वाला’ होता है।विद्वान इस नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह ‘गाय का थन’ मानते हैं।

पुष्य नक्षत्र के स्वामी ग्रह शनि होता है तथा इस नक्षत्र के देवता बृहस्पति हैं। ज्योतिष शास्त्र में पुष्य नक्षत्र को बहुत शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।

इस नक्षत्र में जन्मे जातक दूसरों की भलाई के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। ये मेहनत और परिश्रम से कभी पीछे नहीं हटते हैं। ये अध्यात्म में काफी रुचि रखते हैं। ये चंचल मन और यात्रा और भ्रमण के शौकीन होते हैं ।

अश्लेषा नक्षत्र

अश्लेषा नक्षत्र, नक्षत्रों में नौवां नक्षत्र है।अश्लेषा का अर्थ ‘किसी प्रकार की कुंडली मारने से’ लिया जाता है। अश्लेषा नक्षत्र का प्रतीक ‘एक सर्प’ को माना जाता है। जिसके कारण अश्लेषा नक्षत्र को सर्पों तथा उनके गुणों के प्रभाव में आने वाले नक्षत्र के रूप में देखा जाता है।

अश्लेषा नक्षत्र का स्वामी ग्रह बुध होता है तथा इस नक्षत्र के देवता नाग हैं। इस नक्षत्र में पैदा हुए जातक सफल व्यापारी, चतुर अधिवक्ता, भाषण कला में निपुण होते हैं। ये स्वभाव में हठीले एवं जिद्दी होते हैं ।

मघा नक्षत्र

नक्षत्रों के कड़ी में मघा नक्षत्र का दसवां स्थान है। मघा का अर्थ ‘महान’ होता है तथा इस नक्षत्र का प्रतीक‘राज सिंहासन’ होता है। मघा नक्षत्र का स्वामी ग्रह केतु होता है तथा इस नक्षत्र के देवता पितर होते हैं।

मघा नक्षत्र में पैदा हुए जातक विद्या में तेज, जुबान के पक्के होते हैं। ये स्थानीय राजनीति में अधिक सफल होते हैं। ये निर्भिक, साहसी और घमंडी होते हैं लेकिन स्वयं के कार्य में फुर्तीले होते हैं। ऐसे लोग विद्वानों के बीच सम्मानीय होते हैं ।

पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र

पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र 11वाँ नक्षत्र है। पूर्वा फाल्गुनी का अर्थ पहले का लाल होता है तथा इस नक्षत्र का प्रतीक ‘पलंग का पैर वाला हिस्सा या बिस्तर का झूला’ होता है। इस नक्षत्र स्वामी ग्रह शुक्र है तथा देवता भगा हैं।

इस नक्षत्र में जन्मे जातक मनमोहक छवि और मीठा बोलने वाले होते हैं। ये दूसरों की मदद के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। इनकी सरकारी क्षेत्र में कार्य करने की सम्भावना अधिक होती है। ये स्वभाव से चंचल एवं त्यागी होते हैं। ये अनुशासन में रहना पसंद करते हैं।

उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र

नक्षत्रों में 12वाँ नक्षत्र है। उत्तरा फाल्गुनी का अर्थ ‘बाद का लाल’ होता है तथा इस नक्षत्र का प्रतीक ‘पलंग का पैर का हिस्सा या बिस्तर का झूला ‘होता है।

इस नक्षत्र के स्वामी ग्रह सूर्य है तथा इसके देवता आर्यमन हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक स्वभाव वश शांत, सुव्यवस्थित और दृढ़ निश्चयी होते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक अधिकतर दाँतों की समस्याओं, पेट-सम्बन्धी परेशानियों व शारीरिक थकान से ग्रसित रहते हैं । ये धार्मिक,  ऊर्जा व ज्ञान के भण्डार, दानी, उदार व परोपकारी प्रवृत्ति के होते हैं।

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हस्त नक्षत्र

 हस्त नक्षत्र का नक्षत्रों में 13वाँ स्थान है। हस्त का अर्थ ‘हाथ’ होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ‘हाथ का पंजा’ होता है। यह आकाश में हाथ के पंजे के आकार में फैला है।

हस्त नक्षत्र का स्वामी ग्रह चन्द्रमा होता है तथा इसके देवता आदित्य हैं। यह नक्षत्र समझौते और अभिवादन का प्रतीक है क्योंकि इन्हें हाथ मिलाकर प्रदर्शित किया जाता है।

हस्त नक्षत्र एक आशावादी नक्षत्र हैं जिसमें निर्माण करने की एक अद्वितीय क्षमता है। इस नक्षत्र में पैदा हुए लोग अपने हाथों द्वारा इच्छित वस्तु की पूर्ति करने का सामर्थ्य रखते हैं। ये लोग मेहनती,  बुद्धिमान और तर्कशील होते हैं।

चित्रा नक्षत्र

चित्रा नक्षत्र 14वाँ नक्षत्र है। चित्रा का अर्थ ‘चमकदार, उज्जवल’होता है तथा इस नक्षत्र का प्रतीक ‘एक उज्जवल आभूषण या चमकदार ज्योति’ होता है। चित्रा नक्षत्र का स्वामी ग्रह मंगल है तथा इस नक्षत्र के देवता तेजस्वी हैं।

इस नक्षत्र में जन्मे लोग रूप, सौंदर्य, कला और संरचना से प्रभावित होते हैं। चित्रा नक्षत्र विपरीत लिंग को आकर्षित करने की क्षमता प्रदान करता है। इस नक्षत्र के लोग ऊपरी तौर पर व्यवस्थित दिखाई देने की कोशिश करते हैं लेकिन आंतरिक रूप से वे अव्यवस्थित या निराशावादी हो सकते हैं।

स्वाति नक्षत्र

स्वाति नक्षत्र का नक्षत्रों में 15वाँ स्थान है । स्वातिका अर्थ’ स्वतंत्र होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ‘हवा में लहराता एक छोटा पौधा,  तलवार ’ है जो लचीलेपन,  चपलता वबैचेनी को दर्शाता है।

स्वाति नक्षत्र का स्वामी ग्रह राहु होता है तथा इस नक्षत्र के देवता पवन देव हैं। स्वाति नक्षत्र के लिए एक कहावत है जब स्वाति नक्षत्र में ओंस की बूंद सीप पर गिरती है तो मोती बन जाता है। इसका मतलब मोती नहीं बनता बल्कि ऐसा जातक मोती के समान चमकता है।

इस नक्षत्र में जन्मे लोग एक मजबूत व सौम्य प्रकृति प्रदान करते हैं। ये विनम्र तथा कूटनितिज्ञ होते हैं। संसार का संचालन करने के लिए ये अपनी आकर्षण शक्ति का प्रयोग करते हैं। ऐसे लोगों का सामाजिक शिष्टाचार में दृढ़ विश्वास होता है ।

विशाखा नक्षत्र

विशाखा नक्षत्र 16वाँ नक्षत्र है। विशाखा का अर्थ ‘विभाजित शाखा या एक से अधिक शाखाओं वाला’ होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ‘प्रवेश द्वार’ होता है ।विशाखा नक्षत्र का स्वामी ग्रह बृहस्पति होता है तथा इस नक्षत्र के देवता इंद्रदेव और अग्नि देव हैं।

इस नक्षत्र में जन्मे जातक सदाचारी और न्याय प्रिय होते हैं। इनमें धर्म के प्रति विशेष रुचि देखी जा सकती है। ये व्यक्ति मधुर वाचक होते हैं। इन लोगों में ज्ञान प्राप्ति के लिए उत्सुकता बनी रहती है, जिससे उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करते हैं ।

ये व्यक्ति बहुत ही महत्वाकांक्षी, धनवान और शक्तिशाली होते हैं । ये व्यक्ति पारिवारिक एवं सामाजिक तौर पर मिलनसार, मितभाषी और मददगार होते हैं।

अनुराधा नक्षत्र

 अनुराधा नक्षत्र का नक्षत्रों में 17वाँ स्थान है। अनुराधा का अर्थ ‘अनुवर्ती सफलता’ होता है तथा इस नक्षत्र का प्रतीक ‘कमल पुष्प या एक कुंड’ होता है।

अनुराधा नक्षत्र सफलता से सम्बन्धित है तथा यह विशेष रूप से सहयोग द्वारा प्रसिद्धि व मान्यता प्रदान करता है।

अनुराधा नक्षत्र का स्वामी ग्रह शनि होता है तथा इस नक्षत्र के देवता मित्र हैं। इस नक्षत्र में पैदा हुए लोग मानवता को सहयोग व बढ़ावा देते हैं तथा बड़े समूहों की अगुवाई करने या उन्हें व्यवस्थित करने में सक्षम होते हैं। इस नक्षत्र में संकट के समय कमल पुष्प के समान फलने-फूलने व दृढ़ बने रहने की क्षमता होती है। विदेशी यात्रा व सफलता भी इस नक्षत्र द्वारा समर्पित है।

ज्येष्ठा नक्षत्र

ज्येष्ठा नक्षत्र 18वाँ नक्षत्र है। ज्येष्ठा का अर्थ‘ज्येष्ठ अर्थात सबसे बड़ा’ होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ‘लटके हुए झुमके या छाते की तरह’ होता है। छाते का प्रयोग धूप तथा वर्षा से रक्षा के लिए किया जाता है। उसी प्रकार ज्येष्ठा को रक्षा, सुरक्षा, परिपक्वता, पारलौकिक तथा प्रभुत्व के साथ जुड़े एक नक्षत्र के रूप में देखा जा सकता है।

ज्येष्ठा नक्षत्र गंडमूल नक्षत्र कहलाता है । ज्येष्ठा नक्षत्र का स्वामी ग्रह बुध होता है तथा इस नक्षत्र के देवता इंद्र हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक प्रत्येक बात को काफी सोच –विचार कर बोलने वाले व भाषा में संतुलित होते हैं। इनकी वाणी में चतुराई देखने को मिलती है। इनकी इच्छा शक्ति बहुत प्रबल होती है। इस नक्षत्र का व्यक्ति बहुत ही क्रियाशील होता है ।

मूल नक्षत्र

मूलनक्षत्र 19वाँ नक्षत्र है। मूल का अर्थ ‘जड़’ होता है । इस नक्षत्र का प्रतीक‘अंकुश’ होता है। इस नक्षत्र का  स्वामी ग्रह केतु होता है तथा इस नक्षत्र के देवता नैत्र्मृतिदेव हैं।

मूल नक्षत्र के जातक आमतौर परलक्ष्य केन्द्रित होते हैं तथा ये जातक कठिन से कठिन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास करते रहते हैं। ये आर्थिक रूप से सफल और आरामदायक जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं। इस नक्षत्र में लोक वक्ता, दार्शनिक,  डाक्टर, राजनीतिज्ञ, आध्यात्मिक अध्यापक जन्म लेते हैं।

पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र

पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र 20वाँ नक्षत्र है। इस नक्षत्र को जलम् या तोयम् भी कहा जाता है। पूर्वाषाढ़ा का अर्थ ‘विजय से पूर्व ’होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ‘बाल्टी अथवा हाथी दाँत’ है। इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह शुक्र होता है तथा इस नक्षत्र के देवता जल हैं।

इस नक्षत्र के जातक संवेदनशील, कोमल हृदय के स्वामी और दूसरों की सहायता करने वाले होते हैं। इनमें एक विशिष्ट गुण होता है कि एक बार जो निर्णय लेते हैं फिर उससे पीछे नहीं हटते। यह नक्षत्र धन, कला,  सौंदर्य प्रसाधन, चिकित्सा, काम वासना आदि का कारक है।

उत्तराषाढ़ा नक्षत्र

उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का नक्षत्रों में 21वाँ स्थान है। उत्तराषाढ़ा का अर्थ ‘विजय के बाद’ होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ’हाथी के दाँत’ होता है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का स्वामी ग्रह सूर्य होता है। इस नक्षत्र के देवता विश्व देवा हैं।

पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के जातकों में कृतज्ञता की भावना विशेष रूप से पाई जाती है। ऐसे व्यक्ति धार्मिक आस्था प्रवृत्ति के होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को शिल्प कला जैसे वास्तुकार, मिस्त्री, इंजीनियर, भवन निर्माण करने वाले कार्य अच्छा लगता है। ये लोग संस्कारी, साफ दिल के और मृदुभाषी होते हैं।

श्रवण नक्षत्र

 इस नक्षत्र का नक्षत्रों में 22वाँ स्थान है। श्रवण का अर्थ ‘सुनना’ होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक का न होता है। श्रवण नक्षत्र का स्वामी ग्रह चन्द्रमा होता है तथा इस नक्षत्र के देवता विष्णु हैं।

श्रवण नक्षत्र के जातक सामाजिक व्यवहार में कुशल होते हैं। व्यापार में क्रय- विक्रय से लाभ उठाने वाला, भूमि सम्बन्धी कार्यों में निपुण एवं धार्मिक कार्यों में उत्साह दिखाने वाला होता है।

ये प्रोद्यौगिकी,  इंजीनियरिंग, तेल से सम्बंधित व्यवसाय भी अच्छी तरह से कर सकते हैं। श्रवण नक्षत्र में जन्मे जातक कृतज्ञ, सुन्दर, दाता, लक्ष्मी वान, पंडित, धनवान और विख्यात होता है।

धनिष्ठा नक्षत्र

धनिष्ठा नक्षत्र 23वाँ नक्षत्र हैं। धनिष्ठा का अर्थ ‘सबसे धनवान’ होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ड्रम, बाँसुरी होता है। धनिष्ठा नक्षत्र का स्वामी ग्रह मंगल होता है तथा इस के देवता अष्टवसु हैं।

धनिष्ठा नक्षत्र के जातक ऊर्जावान, तेजस्वी, पराक्रमी,परिश्रम के द्वारा सफलता पाने वाले होते हैं। ऐसे जातक पर जीवन भर मंगल और शनि का प्रभाव रहता है।

इस नक्षत्र में उत्पन्न हुए लोगों में संगीत के प्रति प्राकृतिक योग्यता होती है तथा जीवन के समस्त पहलुओं से उनका उत्तमताल मेल होता है। ऐसे लोग की साहसिक प्रकृति तथा वे यात्राएं करने में रुचि रखते हैं।

शतभिषा नक्षत्र

 शतभिषा नक्षत्र, नक्षत्रों में 24वाँ स्थान है। शतभिषा का अर्थ सौ चिकित्सक अथवा सौचिकित्सा होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक‘चक्र अथवा वृत‘ होता है। शतभिषा नक्षत्र का स्वामी ग्रह राहु होता है तथा इस नक्षत्र के देवता वरुण देव हैं।

इस नक्षत्र में जातक व्यसन युक्त, बिना विचार करने वाला, किसी के वश में न होने वाला तथा शत्रुओं को जीतने वाला होता है। इसके साथ ही जातक कृपण पर स्त्रीगामी तथा विदेश में रहने की कामना करने वाला होता है। ऐसे जातक सत्यनिष्ठ, सत्य के लिए बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटने वाले और नि:स्वार्थ प्रवृत्ति के होते हैं।

पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र

पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र 25वाँ नक्षत्र है। पूर्वाभाद्रपद का अर्थ’ शुभ पद यानि भाग्यशाली पावों वाला’। भाद्र या भद्र का अर्थ होता है सज्जन, शुभ, कल्याणकारी या भाग्य में वृद्धि करने वाला और पद का अर्थ चरण या पाँव से है। इस प्रकार पूर्वाभाद्रपद ऐसा नक्षत्र है, जिसके आगमन से लोगों का कल्याण हो और लोगों के लिए शुभ हो । इस नक्षत्र का प्रतीक‘सोफे के अगले पाये’ होता है।

इस नक्षत्र का ग्रह स्वामी बृहस्पति होता है तथा इस नक्षत्र के देवता अजैकपाद हैं।

इस नक्षत्र में जन्मे जातक दयालु और नेकदिल होने के साथ-साथ खुले विचारों वाले व्यक्ति होते हैं। ये बहुत साहसी और दूसरों की मदद करने में सदा आगे रहते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे लोग अपने आदर्शों और सिद्धांतों पर ही आजीवन चलना पसंद करते हैं।

उत्तराभाद्र पद नक्षत्र

 उत्तराभाद्र पद नक्षत्र26वाँ नक्षत्र है। इसका अर्थ ‘जिसके पाँव भाग्यशाली हो’ होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ‘एक पलंग के पिछले दो पैर’ होता है। यह एक सोफे के पिछले पाये की तरह दिखाई देता है।

उत्तराभाद्र पद नक्षत्र का स्वामी ग्रह शनि होता है तथा इस नक्षत्र के स्वामी अहिर्बुधन्य हैं। इस नक्षत्र के जातक निष्पक्ष व्यक्तित्व के स्वामी होते हैं। ये बहुत बुद्धिमान और विवेकशील व्यक्ति होते हैं।

ये किसी भी कार्य क्षेत्र में उच्च पद को प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग दयालु व धार्मिक और मानवतावादी कार्यों की ओर आकर्षित होते हैं।

रेवती नक्षत्र

रेवती नक्षत्र 27वाँ और नक्षत्रों में आखिरी नक्षत्र है। रेवती का अर्थ‘धनवान’ होता है। इस नक्षत्र का प्रतीक ‘एक ढ़ोल या समुद्र में तैरती एक मछली’होता है। रेवती नक्षत्र का स्वामी ग्रह बुध होता है। तथा इस नक्षत्र के देवता पूषा हैं।

इस नक्षत्र में विद्या का आरंभ, गृहप्रवेश, विवाह, सम्मान प्राप्ति, देव प्रतिष्ठा इत्यादि कार्य सम्पन्न किए जाते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक बहुत समृद्ध होते हैं। ये आकर्षक और सामाजिक होते हैं। ये स्वतंत्र और अतिमहत्वकांक्षी होते हैं।

इस नक्षत्र के जातक मधुरभाषी,  व्यवहार-कुशल और स्वतंत्र प्रवृत्ति के होते हैं। यह नक्षत्र सुरक्षित व सार्थक यात्राओं से भी सम्बंधित है। रेवती सर्वाधिक आशावादी नक्षत्रों में से एक है जो विशाल लक्ष्य बनाकर उन्हें प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करता है।

आज हम इस पोस्ट में नक्षत्रों के बारे में बताएं। उम्मीद है कि यह पोस्ट आपको अच्छी लगी होगी।

 

 

 

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